रोज़नामचा – कविता: मनोज शर्मा

हवा में नमी नहीं है
फिर भी खिल गए हैं सभी फूल
धधकते सूरज के इस कालखंड में
एक चित्रकार
रंग रहा है फफोले भरे पैर
और सड़कें शर्मिंदा हैं

दूर से आ रही हैं आवाज़ें
सुनायी पड़ता है महासागरों का नाद
सपनों तक में
धरती की सारी माताएँ
दुआएं मांगती नज़र आती हैं

देवता तक नहीं बन रहे महान
लेकिन बिलबिला रहा है राजा
जैसे कुछ बुदबुदा रहा है
तैरती आवाज़ों के सामने लेकिन
उसकी आत्ममुग्धता
सीटी सी भी नहीं बज रही है

बुजुर्ग सुना रहे हैं कहानियाँ
जहां पुरातन से भी पुराना काल है
संगीतकार
चिर-परिचित उम्मीद संग
छेड़ रहा है राग
जैसे फूल खिल गए हैं
जैसे अभी-अभी बरसा है मींह

और इसी कालखंड में
अपने घर लौटा
मनुष्य
बिना किसी आत्ममुग्धता
घर की दहलीज़ पर
टेक रहा है
माथा!

– मनोज शर्मा
प्रतिरोध की कविता के जाने-माने कवि।
एक्टिविस्ट पत्रकार – अनुवादक – कवि – साहित्यकार।
इनके काव्य संग्रह हैं, यथार्थ के घेरे में, यकीन मानो मैं आऊंगा, बीता लौटता है और ऐसे समय में।
उद्भाव ना पल प्रतिपल आदि के कविता विशेषांक आदि में संपादकीय सहयोग।
इनकी कविताओं का अनुवाद डोंगरी पंजाबी मराठी अंग्रेजी आदि में।
संस्कृति मंच की स्थापना जम्मू में।
संप्रति नाबार्ड में उच्च पोस्ट पर।

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